राजस्थान की प्राचीन
सभ्यताएँ: एक परिचय
राजस्थान का इतिहास मानव सभ्यता के उद्भव जितना ही प्राचीन है। यहाँ पाषाण काल
से लेकर धातु युग तक के निरंतर प्रमाण मिलते हैं।
- प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि: लूनी नदी के तट (पश्चिमी राजस्थान) और अन्य क्षेत्रों
में पाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- भौगोलिक संदर्भ: ऋग्वैदिक
काल से पूर्व, राजस्थान का पश्चिमी भाग (जो आज
रेगिस्तान है) एक समुद्र (टेथिस सागर का अवशेष) था। यहाँ सरस्वती और दृषद्वती नदियाँ बहती थीं, जिनके कांठों (किनारों) पर मानव सभ्यता फली-फूली।
- मानव विकास: इस काल
का मानव पशुपालन, मृदभाण्ड (मिट्टी के बर्तन) निर्माण,
भवन निर्माण और व्यापार-वाणिज्य में निपुण हो चुका था।
1. कालीबंगा सभ्यता (Kalibangan
Civilization)
यह राजस्थान की प्रथम काली और सबसे महत्वपूर्ण कांस्य युगीन (Bronze Age) सभ्यता है। यह हड़प्पा सभ्यता की पूर्ववर्ती (Pre-Harappan), समकालीन और परवर्ती तीनों चरणों का प्रतिनिधित्व
करती है।
स्थिति एवं भौगोलिक विस्तार:
- स्थान: हनुमानगढ़ जिला (पूर्व में गंगानगर जिले का भाग)।
- नदी: घग्घर नदी
का तट (प्राचीन सरस्वती
नदी)।
- समय काल (C-14 पद्धति): 2300 ई.पू.
से 1750 ई.पू. के मध्य (NCERT व
रेडियो कार्बन डेटिंग के अनुसार)।
खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation):
- खोज: 1951-52 ई.
में अमलानंद घोष
(A. Ghosh) द्वारा। (स्वतंत्र भारत में खोजा गया पहला पुरातात्विक स्थल)।
- उत्खनन: 1961-1969 ई. के मध्य बी.बी. लाल
(बृजवासी लाल) और बी.के. थापर (बालकृष्ण थापर) द्वारा।
- स्तर: यहाँ खुदाई 5 स्तरों में की गई।
- प्रथम व द्वितीय स्तर: हड़प्पा से प्राचीन
(प्राक्-हड़प्पा)।
- तीसरा, चौथा व
पाँचवा स्तर: हड़प्पा के समकालीन (विकसित हड़प्पा)।
नगर नियोजन एवं स्थापत्य (Town Planning):
- दो टीले: नगर दो भागों में विभक्त था—पश्चिमी टीला (दुर्ग/गढ़ी
क्षेत्र) और पूर्वी टीला (निचला नगर)। दोनों ही एक सुरक्षा दीवार (परकोटा) से
घिरे थे।
- सड़कें: सड़कें
एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं (ग्रिड
पद्धति/चेसबोर्ड पद्धति)। मुख्य सड़कें 7.2 मीटर चौड़ी थीं।
- ईंटें:
- मकानों में कच्ची
ईंटों (Sun-dried bricks) का प्रयोग (इसलिए
इसे 'दीन-हीन बस्ती' भी कहा
गया)। नालियों, कुओं और स्नानागार में पक्की ईंटों का प्रयोग।
- ईंटों का अनुपात: 30 × 15 × 7.5 सेमी (4:2:1)। परकोटे की ईंटों का आकार 30
× 20 × 10 सेमी था।
- नाली व्यवस्था: यहाँ लकड़ी की नालियों के भी साक्ष्य मिले हैं, जो विश्व में अद्वितीय हैं।
कृषि एवं अर्थव्यवस्था (Agriculture
& Economy):
- जुते हुए खेत: परकोटे के बाहर
दक्षिण-पूर्व में दोहरे जुते
हुए खेत (Double cropping pattern) के
प्रमाण मिले हैं (विश्व में प्राचीनतम)।
- फसलें: एक साथ दो
फसलें—गेहूँ और जौ उगाने के साक्ष्य। इसके अलावा चना और सरसों के प्रमाण भी मिले हैं।
- पशुपालन: ऊँट (अस्थियाँ मिलीं), कुत्ता
(पालतू), गाय, बैल, भैंस, भेड़-बकरी और सूअर।
- उद्योग: सीप और शंख की चूड़ियाँ, मनके,
और पक्की मिट्टी के खिलौने (टेराकोटा)।
धार्मिक एवं सामाजिक जीवन:
- अग्नि वेदिकाएँ: दुर्ग क्षेत्र में एक चबूतरे पर सात आयताकार
अग्नि वेदिकाएँ (हवन कुंड) मिली
हैं। पास में कुआँ और स्नान स्थल भी था।
- अंतिम संस्कार (3 विधियाँ):
- पूर्ण समाधीकरण: आयताकार/अण्डाकार गर्त
में शव को सीधा लिटाना (सिर उत्तर, पैर दक्षिण)।
- आंशिक समाधीकरण: पशु-पक्षियों के खाने के
बाद शेष हड्डियों को दफनाना (वृत्ताकार गर्त)।
- दाह संस्कार: कलश
शवाधान (मृदभाण्ड निक्षेप)।
- शल्य
चिकित्सा (Surgery): एक बालक की
खोपड़ी मिली है जिसमें 6 छिद्र हैं। यह
'हाइड्रोस्फलीज' (मस्तिष्क शोध) रोग और आदिम शल्य चिकित्सा का प्रमाण है।
प्रमुख अवशेष एवं साक्ष्य (Key Findings):
- काली चूड़ियाँ: 'कालीबंगा' का शाब्दिक अर्थ (पंजाबी भाषा में)।
- भूकंप के साक्ष्य: विश्व
में भूकंप के प्राचीनतम प्रमाण यहीं से मिले हैं।
- मुहरें: मेसोपोटामिया
जैसी बेलनाकार मुहरें।
- व्याघ्र (Tiger) का अंकन: एक मुहर पर व्याघ्र का
चित्र (जबकि सिंधु क्षेत्र में अब व्याघ्र नहीं है)।
- मृदभाण्ड: लाल
रंग के बर्तन जिन पर काली और सफेद रेखाओं से अलंकरण (फूल-पत्ती, पक्षी) किया गया है। ये पतले और हल्के हैं।
- अन्य: तंदूर
जैसे चूल्हे, स्वास्तिक का चिन्ह, मापन के बाट।
पतन के कारण:
- संक्रामक रोग (के.यू.आर. केनेडी के अनुसार)।
- नदी मार्ग में परिवर्तन या सरस्वती नदी का सूखना।
विशेष नोट (भौगोलिक संदर्भ - सरस्वती नदी):
काजरी (CAZRI), जोधपुर ने सेटेलाइट इमेज से
प्रमाण दिया है कि यहाँ सरस्वती नदी बहती थी। वर्तमान में जैसलमेर में 'लाठी सीरीज' (भूगर्भिक जल पट्टी) उसी का अवशेष है,
जहाँ सेवण (लीलोण) घास (Lasiurus Sindicus) उगती है। इसे 'King
of Desert' कहा जाता है।
2. आहड़ सभ्यता (Ahar
Civilization)
आहड़, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की बनास नदी घाटी
में विकसित हुई, इसलिए इसे 'बनास संस्कृति' (Banas Culture) भी कहा जाता है। यह एक ग्रामीण (Rural) और ताम्र-पाषाण युगीन (Chalcolithic) सभ्यता थी।
उपनाम (महत्वपूर्ण):
- ताम्रवती नगरी: प्राचीन काल में यहाँ तांबे के औजारों का निर्माण
बड़े पैमाने पर होता था।
- आघाटपुर / आघाट दुर्ग: 10वीं-11वीं
शताब्दी के अभिलेखों में यह नाम मिलता है।
- धूलकोट: स्थानीय लोग इसे धूलकोट (रेत का टीला) कहते हैं।
स्थिति एवं कालक्रम:
- स्थान: उदयपुर जिला।
- नदी: आयड़
नदी (उदयसागर झील में गिरने के बाद इसका नाम बेड़च हो जाता है)।
- समय काल: कार्बन डेटिंग और साक्ष्यों के आधार पर यह लगभग 4000 वर्ष पुरानी (1900 ई.पू. - 1200 ई.पू.) मानी जाती है।
खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation):
- खोज (1953): अक्षय
कीर्ति व्यास।
- प्रथम उत्खनन (1954): रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal)।
- व्यापक उत्खनन (1961-62): पुणे विश्वविद्यालय के एच.डी. सांकलिया (हसमुख धीरजलाल सांकलिया) के नेतृत्व में।
नगर नियोजन एवं आवास (Settlement Structure):
- ग्रामीण परिवेश: यह पूरी तरह से एक ग्रामीण संस्कृति थी।
- मकान निर्माण: यहाँ के निवासी मकान बनाने में कच्ची ईंटों और पत्थर (schist/स्लेट
पत्थर) का प्रयोग करते थे। नींव में काला पत्थर (Schist) भरा जाता था।
- छतें: छतें बांस और बल्लियों पर मिट्टी का लेप करके बनाई
जाती थीं।
- संयुक्त परिवार प्रथा: एक मकान में एक साथ 6 चूल्हे मिले हैं, जो सामूहिक भोजन व्यवस्था या बड़े संयुक्त परिवार का संकेत देते हैं।
एक चूल्हे पर मानव हथेली की छाप भी मिली है।
मृदभाण्ड एवं उद्योग (Pottery & Industry):
- काले व लाल मृदभाण्ड (Black & Red Ware): यहाँ की
विशिष्ट पहचान है। इन्हें 'उल्टी तपाई विधि' (Inverted Firing
Technique) से पकाया जाता था, जिससे ये
ऊपर से काले और नीचे से लाल होते थे। स्थानीय भाषा में इन्हें 'गोरे' व 'कोठे' कहा जाता है (अनाज रखने के बड़े पात्र)।
- तांबा उद्योग: यहाँ
तांबा गलाने की भट्टियाँ मिली हैं। ये लोग तांबे के उपकरण (कुल्हाड़ी, अंगूठियाँ, चूड़ियाँ) बनाते थे, इसीलिए इसे ताम्रनगरी कहा गया।
- बनासियन बुल (Banasian Bull): यहाँ से टेराकोटा (पक्की मिट्टी)
से बनी बैल की आकृतियाँ मिली हैं, जिन्हें
पुरातत्वविदों ने 'बनासियन बुल' की
संज्ञा दी है।
व्यापार एवं विदेशी संपर्क (Trade & Foreign Contact):
- यूनानी मुद्रा: यहाँ
से 6 ताँबे की मुद्राएँ मिली हैं। एक
मुद्रा पर यूनानी देवता 'अपोलो' (Apollo) का
चित्र है, जिनके हाथ में तीर और पीछे तरकश है। यह
यूनानी (Greek) संपर्क का पुख्ता प्रमाण है।
- लाजवर्त मनके: बिना हत्थे के जलपात्र (ईरानी शैली) और विशिष्ट
मनके बाह्य व्यापार को दर्शाते हैं।
जीवन शैली एवं अर्थव्यवस्था:
- कृषि: प्रमुख फसलें चावल, गेहूँ और ज्वार थीं।
- पशुपालन: ये लोग हाथी और घोड़े से परिचित थे। खाने में मछली, कछुआ, भेड़,
बकरी और हिरण का मांस भी प्रयुक्त होता था (हड्डियों के
साक्ष्य)।
- जल निकासी: गंदा पानी निकालने के लिए 'चक्रकूप' (Ring Well / सोखता गड्ढा) विधि अपनाई
जाती थी।
- आभूषण: कीमती पत्थरों (गोमेद, स्फटिक) और तांबे के आभूषण। मृतक के साथ आभूषण दफनाने की प्रथा थी।
अन्य प्रमुख तथ्य:
- बनास घाटी में लगभग 50 पुरास्थल
खोजे गए हैं (जैसे गिलूण्ड, बालाथल, ओजियाना)।
- यहाँ लोहे के उपकरण (79 उपकरण)
भी मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि बाद के चरणों में
यहाँ लोह युग का आगमन हो गया था।
3. गणेश्वर सभ्यता (Ganeshwar
Civilization)
यह सभ्यता राजस्थान के पुरातत्व इतिहास में एक
विशिष्ट स्थान रखती है। इसे "ताम्रयुगीन
सभ्यताओं की जननी" (Mother of Copper Civilizations) कहा जाता है।
स्थिति एवं भौगोलिक विस्तार:
- जिला: पूर्व में सीकर, वर्तमान में नीम का थाना (Neem
Ka Thana) जिला।
- स्थान: रेवासा गाँव के पास, खंडेला की
पहाड़ियाँ।
- नदी: कांतली नदी
(Kantli River) के तट पर। (यह एक अंतःप्रवाही नदी है जो अब
मौसमी है, लेकिन प्राचीन काल में इसमें पर्याप्त जल
था)।
कालक्रम एवं खोज:
- समय काल: कार्बन डेटिंग के अनुसार लगभग 2800 ई.पू.। यह
हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन संस्कृति है।
- खोज एवं
उत्खनन: 1977 ई. में रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal) और 1978-79 में विजय कुमार के निर्देशन में।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Features):
- तांबा आपूर्ति केंद्र: गणेश्वर
के पास 'खेतड़ी'
(Khetri) की तांबे की खदानें मौजूद थीं। यहाँ से हड़प्पा और
मोहनजोदड़ो को तांबे का निर्यात किया जाता था।
- मृदभाण्ड: यहाँ
से प्राप्त मिट्टी के बर्तन 'कपिशवर्णी मृदपात्र' (Ochre Colored Pottery - OCP) शैली के हैं। इन पर काले और नीले रंग का अलंकरण मिलता है।
- पत्थर के बाँध (Stone Dams): यहाँ मकान और बाँध बनाने में पत्थरों का
प्रयोग होता था। ईंटों का
प्रयोग बिल्कुल नहीं हुआ है। बस्ती को बाढ़ से
बचाने के लिए पत्थर के मज़बूत बाँध बनाए गए थे (यह भारत में अपनी तरह का
एकमात्र उदाहरण है)।
जीवन शैली एवं उपकरण:
- शुद्ध तांबे के उपकरण: यहाँ
मिले उपकरणों (कुल्हाड़ी, तीर, भाले,
सुइयाँ) में 99% तक तांबा है, जो इनकी उन्नत धातु-कला को दर्शाता है।
- मछली पकड़ने का काँटा: यहाँ
से तांबे का मछली पकड़ने का काँटा (Fish hook) मिला
है।
- निष्कर्ष: इससे प्रमाणित होता है
कि कांतली नदी उस समय बारहमासी (Perennial) थी और यहाँ के लोग मांसाहारी/मत्स्य प्रेमी थे।
- बाणाग्र (Arrowheads): तांबे के बाणाग्र मिले हैं, जो यह बताते हैं कि
ये लोग शिकार पर निर्भर थे।
पशुपालन:
- यहाँ से प्राप्त हड्डियों के आधार पर पशुओं को तीन
श्रेणियों में बांटा गया है:
- घरेलू: गाय, बैल, भेड़, बकरी,
कुत्ता, गधा।
- बस्ती के आसपास: सूअर।
- जंगली (शिकार योग्य): नीलगाय, हिरण, खरगोश, मछली आदि।
4. बैराठ सभ्यता (Bairath
Civilization)
बैराठ एक लौह युगीन (Iron Age) सभ्यता है, जो प्राचीन काल में 'मत्स्य महाजनपद' की
राजधानी 'विराटनगर' के रूप में प्रसिद्ध थी।
स्थिति एवं भौगोलिक विस्तार:
- जिला: जयपुर
(वर्तमान में कोटपूतली-बहरोड़ जिले के अंतर्गत)।
- स्थान: शाहपुरा
उपखंड, विराटनगर।
- नदी: बाणगंगा नदी (इसे 'अर्जुन की गंगा' और 'रुण्डित
नदी' भी कहते हैं)।
- पहाड़ियाँ (डूंगरी): यहाँ
तीन प्रमुख टीले/पहाड़ियाँ हैं जहाँ उत्खनन हुआ:
- बीजक की डूंगरी (Bijak Ki Pahari) – (सर्वाधिक महत्वपूर्ण)
- भीम डूंगरी (Bhim Dungri)
- गणेश डूंगरी (Ganesh Dungri)
खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation):
- 1936-37: दयाराम
साहनी (Dayaram Sahni) द्वारा प्रथम उत्खनन।
- 1962-63: नील रत्न
बनर्जी (N.R. Banerjee) और कैलाश नाथ
दीक्षित (K.N. Dikshit) द्वारा पुनः उत्खनन।
- 1837: कैप्टन बर्ट
(Captain Burt) ने बीजक की डूंगरी से अशोक का 'भाब्रू शिलालेख' खोजा।
ऐतिहासिक कालखण्ड (Historical
Periods):
बैराठ में हमें इतिहास के कई दौर एक साथ देखने को मिलते हैं:
1. महाभारत काल:
- किंवदंतियों के अनुसार, पांडवों ने अपना अज्ञातवास विराटनगर के राजा विराट के यहाँ बिताया था।
- भीम डूंगरी पर 'भीम ताल'
(जलाशय) मौजूद है।
2. मौर्य काल (सम्राट अशोक):
- भाब्रू शिलालेख (Bhabru Edict): यह बैराठ की सबसे बड़ी खोज है।
- खोज: 1837 में
कैप्टन बर्ट ने खोजा।
- महत्व: इसमें
अशोक स्पष्ट रूप से बुद्ध, धम्म और संघ में आस्था प्रकट
करता है। यह अशोक के बौद्ध होने
का सबसे पुख्ता प्रमाण है।
- वर्तमान स्थिति: 1840 में इसे काटकर कलकत्ता
संग्रहालय (The Asiatic Society of Bengal) ले
जाया गया, जहाँ यह आज भी सुरक्षित है।
- बौद्ध स्तूप व मंदिर: बीजक
की पहाड़ी पर एक गोलाकार
बौद्ध मंदिर (Circular Temple) के अवशेष मिले हैं।
यह भारत में मंदिर स्थापत्य का प्राचीनतम उदाहरण माना जाता है। यहाँ से
अशोक स्तंभ के टुकड़े भी मिले हैं।
3. यूनानी (Indo-Greek) काल:
- यहाँ एक कपड़े की पोटली में 36 चाँदी की मुद्राएँ मिली
हैं:
- 8 मुद्राएँ: पंचमार्क
(आहत) सिक्के (भारत के प्राचीनतम सिक्के)।
- 28 मुद्राएँ: इंडो-ग्रीक
(Indo-Greek) शासकों की।
- इनमें से 16 मुद्राएँ यूनानी राजा मिनेन्डर (Menander) की हैं। इससे यहाँ यूनानी अधिकार या
व्यापारिक संबंधों की पुष्टि होती है।
चित्रकला एवं शैलाश्रय:
- बैराठ को 'प्राचीन युग की चित्रशाला' कहा जाता है।
- यहाँ की चट्टानों (Rock
Shelters) और शैलाश्रयों पर लाल रंग (गेरू) से बने चित्र मिले
हैं।
- बर्ड राइडर (Bird Rider): यहाँ नहीं, बल्कि 'गरदड़ा
(बूंदी)' में बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग है, लेकिन बैराठ में भी शिकार और ज्यामितीय आकृतियों के शैलचित्र बहुतायत
में हैं।
विध्वंस:
- हूण आक्रमण: 6वीं शताब्दी में हूण शासक मिहिरकुल (Mihirakula) ने बैराठ पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने भी अपने यात्रा वृतांत में यहाँ के बौद्ध मठों के विध्वंस और
मिहिरकुल के अत्याचारों का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने बैराठ के लिए 'पा-रि-या-त्र' शब्द का प्रयोग किया।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
- कपड़ा: बैराठ
से हाथ से बुने हुए सूती कपड़े के अवशेष मिले हैं (बालाथल के बाद दूसरी जगह जहाँ
कपड़ा मिला)।
- शंख लिपि: यहाँ
पत्थरों पर 'शंख लिपि' के
प्रमाण मिले हैं, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
- लोहा: यहाँ
लोहे के उपकरण बनाने और परिष्कृत करने के कारखाने भी थे।
5. बालाथल सभ्यता (Balathal
Civilization)
बालाथल, मेवाड़ क्षेत्र में एक समृद्ध
ताम्र-पाषाणिक (Chalcolithic) बस्ती थी, जहाँ ग्रामीण संस्कृति के साथ-साथ विकसित स्थापत्य कला के भी प्रमाण मिले
हैं।
स्थिति एवं कालक्रम:
- स्थान: उदयपुर
जिले की वल्लभनगर तहसील में।
- नदी: बेड़च नदी के प्रवाह
क्षेत्र में।
- समय काल: C-14 पद्धति
के अनुसार इसका काल 3000 ई.पू. से 2500 ई.पू. माना गया है (हड़प्पा के समकालीन)।
खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation):
- वर्ष: 1993 ई.।
- नेतृत्व: डॉ. वी.एन. मिश्र (V.N. Misra) - दक्कन कॉलेज, पुणे।
- सहयोगी: डॉ.
वी.एस. शिंदे, डॉ. आर.के. मोहंती और राजस्थान
विद्यापीठ के डॉ. ललित पाण्डेय व देव कोठारी।
- विस्तार: लगभग 1400 वर्ग मीटर क्षेत्र में खुदाई की गई।
स्थापत्य की अद्भुत खोज (Unique Architecture):
- 11 कमरों का विशाल भवन: यहाँ खुदाई में एक 11 कमरों वाला विशाल भवन मिला है। यह संभवतः किसी दुर्ग (Fortification) या प्रमुख सार्वजनिक भवन
का हिस्सा रहा होगा। यह बालाथल की सबसे बड़ी विशेषता है।
- सुरक्षा दीवार: बस्ती के चारों ओर पत्थर और मिट्टी से बनी
सुरक्षा प्राचीर (Wall)
के साक्ष्य मिले हैं।
बुना हुआ कपड़ा (Woven Cloth) - अति महत्वपूर्ण:
- बैराठ के अलावा, बालाथल राजस्थान का दूसरा ऐसा स्थल है जहाँ हाथ से बुने हुए कपड़े का टुकड़ा मिला है।
- यह 5वीं सदी
ई.पू. का माना जाता है, जो यहाँ के लोगों की बुनाई कला
(Weaving) के ज्ञान को प्रमाणित करता है।
उद्योग एवं अर्थव्यवस्था:
- लोहा गलाने की भट्टियाँ: यहाँ से लोहा गलाने की 5 भट्टियाँ मिली हैं। यद्यपि यह ताम्र-पाषाणिक स्थल था, लेकिन ऊपरी स्तरों पर लौह युग के
प्रमाण मिलते हैं जो बताते हैं कि बाद में यहाँ लोहे का काम शुरू हो गया था।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था: यहाँ के लोग कृषि, पशुपालन और शिकार तीनों करते थे।
- पशुपालन: खुदाई में 32 प्रजातियों के जानवरों की हड्डियाँ
मिली हैं (गाय, बैल, भैंस, भेड़,
बकरी)।
- कृषि: जौ, गेहूँ,
सरसों।
मृदभाण्ड एवं अन्य साक्ष्य:
- मृणमूर्तियाँ (Terracotta Figures): यहाँ से पक्की मिट्टी के बैल (Bull) और कुत्ते की मूर्तियाँ मिली हैं।
- सिक्के: यहाँ से 3 तांबे के सिक्के मिले हैं जिन पर हाथी और चंद्रमा की आकृतियाँ बनी हैं।
- योगी की समाधि: (NCERT/GK अपडेट) बालाथल से एक योगी की मुद्रा में गड़ा हुआ कंकाल (Skeleton buried in Yoga posture) मिला
है, जिसे भारत में कुष्ठ रोग (Leprosy) का सबसे प्राचीन प्रमाण (लगभग 4000 साल पुराना)
माना जाता है।
6. बागोर सभ्यता (Bagor
Civilization)
बागोर न केवल राजस्थान बल्कि भारत का एक प्रमुख प्रागैतिहासिक (Pre-historic) स्थल है। इसे "आदिम संस्कृति का संग्रहालय" भी कहा जाता है।
स्थिति एवं भौगोलिक विस्तार:
- जिला: भीलवाड़ा
(माण्डल तहसील)।
- नदी: कोठारी नदी (Kothari River) के तट पर।
- स्थानीय नाम: यहाँ
के टीले को 'महासतियों का टीला' कहा जाता है।
कालक्रम (Timeline):
- यह मुख्य रूप से मध्यपाषाण कालीन (Mesolithic) स्थल है।
- यहाँ सभ्यता के तीन चरण (Stone
Age, Copper Age, Iron Age) देखने को मिलते हैं।
खोज एवं उत्खनन:
- वर्ष: 1967-1969 ई.।
- नेतृत्व: डॉ. वीरेन्द्र नाथ मिश्र (V.N. Misra) - (पुणे विश्वविद्यालय और डेक्कन
कॉलेज)
और डॉ. एल.एस. लेश्निक (जर्मनी)।
सबसे महत्वपूर्ण खोज (Most
Important Finding):
- पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य: भारत में पशुपालन (Animal Husbandry) के सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण बागोर से
ही मिले हैं। यहाँ के निवासी आखेट (शिकार) और पशुपालन दोनों करते थे।
उपकरण एवं जीवन शैली:
- लघु पाषाण उपकरण (Microliths): यहाँ से हजारों की संख्या में पत्थर के
बहुत छोटे और नुकीले औजार मिले हैं (जैसे- ब्लेड, ट्रेपेज,
ट्राइएंगल)। ये शिकार में तीर के आगे लगाए जाते थे।
- तांबे की सुई: यहाँ
से एक तांबे की सुई मिली है (सभ्यता के दूसरे चरण में), जो यह बताती है कि यहाँ के लोग सिलाई करना जानते थे।
- कृषि: 14 प्रकार
की कृषि के प्रमाण मिले हैं।
कंकाल व अंतिम संस्कार:
- यहाँ से 5 मानव
कंकाल मिले हैं।
- समाधीकरण की
प्रक्रिया में शव का सिर पश्चिम में और पैर पूर्व में रखे जाते थे (जो
सामान्य प्रथा से थोड़ा अलग था)। कंकालों के साथ खाने-पीने का सामान नहीं, बल्कि हड्डियाँ और औजार दफनाए गए थे।
7. गिलूण्ड सभ्यता (Gilund
Civilization)
गिलूण्ड, आहड़ संस्कृति (बनास संस्कृति) का ही
एक महत्वपूर्ण केंद्र है, लेकिन इसकी कुछ विशेषताएँ आहड़ से
अलग हैं।
स्थिति:
- जिला: राजसमंद।
- नदी: बनास नदी के तट पर।
- स्थानीय नाम: यहाँ
के टीले को 'मोड़िया मगरी'
(Modiya Magri) कहा जाता है।
उत्खनन:
- 1957-58: बी.बी. लाल (B.B. Lal)।
- 1998-2003: वी.एस. शिंदे (V.S. Shinde) और ग्रेगरी पोसहल (पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय, अमेरिका)।
सबसे बड़ी विशेषता (Key Feature):
- पक्की ईंटों का प्रयोग: जहाँ आहड़ के लोग कच्ची ईंटों का प्रयोग करते थे, वहीं गिलूण्ड में पक्की ईंटों
(Burnt Bricks) का प्रचुर प्रयोग मिला है। यह बनास संस्कृति में अपवाद है।
अन्य साक्ष्य:
- हाथी दांत की चूड़ियाँ: यहाँ हाथी दांत के काम के प्रमाण मिले हैं।
- मिट्टी के खिलौने: पहिएदार
गाड़ी और जानवरों की मूर्तियाँ।
- मृदभाण्ड: यहाँ 5 प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं (सादे, काले,
पुलिसदार, भूरे और लाल)।
8. रंगमहल सभ्यता (Rangmahal Civilization)
कालीबंगा के पास ही हनुमानगढ़ जिले में एक और महत्वपूर्ण पुरास्थल है, जो मुख्य रूप से कुषाण कालीन और गुप्त कालीन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता
है।
स्थिति एवं उत्खनन:
- जिला: हनुमानगढ़।
- नदी: घग्घर
नदी।
- उत्खनन (1952-54): इसका
उत्खनन स्वीडन (Sweden) के पुरातात्विक दल द्वारा डॉ. हन्नारिड (Dr. Hanna Ryd) के निर्देशन में किया गया। (यह प्रश्न
कई बार पूछा गया है कि किस सभ्यता का उत्खनन विदेशी दल ने किया)।
प्रमुख साक्ष्य (Key Findings):
- गुरु-शिष्य की मूर्ति: यहाँ
से पक्की मिट्टी (Terracotta) की बनी एक मूर्ति मिली है
जिसमें गुरु और शिष्य को दर्शाया गया है। यह यहाँ की सबसे प्रसिद्ध कलाकृति
है।
- गांधार शैली: यहाँ
की मूर्तियों पर गांधार कला शैली (Gandhara Art) का प्रभाव दिखाई देता है।
- मृदभाण्ड: यहाँ
से लाल पॉलिशदार मृदभाण्ड (Red
Polished Ware) मिले हैं। इन पर काली रेखाओं से चित्रकारी नहीं
है (जो कालीबंगा में थी), बल्कि ये चमकदार हैं।
- घंटाकार मृदपात्र: उल्टी
घंटी के आकार के बर्तन।
- अन्य: बच्चों
के खेलने की मिट्टी की पहियेदार गाड़ी।
9. नोह सभ्यता (Noh
Civilization)
यह पूर्वी राजस्थान (भरतपुर) की एक महत्वपूर्ण लौह युगीन सभ्यता है।
स्थिति:
- जिला: भरतपुर।
- नदी: रूपारेल नदी (Ruparel River) के किनारे।
- उत्खनन: 1963-64 में
रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal) द्वारा।
🗿 यक्ष प्रतिमा (Jakha Baba):
- यहाँ की सबसे बड़ी उपलब्धि एक विशाल 'यक्ष' (Yaksha) की मूर्ति
है, जिसे स्थानीय लोग 'जाख बाबा' (Jakha Baba) कहते हैं। यह शुंग कालीन मानी जाती है।
5 सांस्कृतिक युग:
- यहाँ खुदाई में पाँच अलग-अलग सांस्कृतिक युगों के अवशेष एक साथ मिले हैं:
- महाभारत काल
- लौह काल (Iron
Age)
- मौर्य काल
- शुंग काल
- कुषाण काल
- पक्षी चित्रित ईंट: यहाँ से एक ऐसी ईंट मिली है जिस पर पक्षी का चित्र बना हुआ है।
- स्वास्तिक: बर्तनों पर स्वास्तिक (Swastika) का चिन्ह मिला है।
10. रेड सभ्यता (Rairh
Civilization)
इसे राजस्थान के इतिहास में बहुत ऊँचा दर्जा प्राप्त है। इसे "प्राचीन भारत का टाटानगर" कहा जाता है।
स्थिति:
- जिला: टोंक
(निवाई तहसील)।
- नदी: ढील नदी (Dheel
River)।
- उत्खनन: 1938-40 में
के.एन. पुरी (K.N. Puri) द्वारा।
प्राचीन भारत का
टाटानगर (Tatanagar of Ancient India):
- सिक्कों का भण्डार: यहाँ
से 3075 चाँदी की आहत मुद्राएँ (Punch
Marked Coins) मिली हैं। यह एशिया में अब तक का
सिक्कों का सबसे बड़ा
भण्डार है।
- इसलिए इसे प्राचीन भारत का टाटानगर कहा जाता है।
अन्य साक्ष्य:
- लोहा सामग्री: यहाँ लोहे के औजार और उपकरण इतनी बड़ी मात्रा में
मिले हैं कि यह एक औद्योगिक नगरी प्रतीत होती है।
- बंदर की मूर्ति: मिट्टी का बना एक बर्तन जिस पर बंदर का चित्र
है, यहाँ की कला का बेजोड़ नमूना
है।
- आलीशान इमारतें: यहाँ के मकान ईंटों के बने थे और काफी व्यवस्थित थे।
11. नगर सभ्यता (Nagar/Karkota
Nagar)
ध्यान दें: 'नगरी'
(चित्तौड़गढ़) और 'नगर' (टोंक) दो अलग-अलग सभ्यताएँ हैं।
स्थिति:
- जिला: टोंक (उनियारा कस्बा)।
- प्राचीन नाम: मालव नगर या कर्कोट नगर। प्राचीन काल में यह मालव गणराज्य (Malav Janapada) की राजधानी थी।
साक्ष्य:
- सिक्के: यहाँ से मालव गणराज्य के 6000 ताम्बे के सिक्के मिले हैं।
- महिषासुर मर्दिनी: यहाँ से गुप्तकालीन सलेटी पत्थर की बनी 'महिषासुर मर्दिनी' (दुर्गा) की मूर्ति मिली है।
- कामदेव-रति: यहाँ से मोदक (लड्डू) खाते हुए गणेश और
रति-कामदेव की मृणमूर्तियाँ भी मिली हैं।
12. भीनमाल सभ्यता (Bhinmal Civilization)
यह पश्चिमी राजस्थान (जालोर) का एक प्रमुख ऐतिहासिक नगर है जो विदेशी व्यापार
का केंद्र था।
स्थिति:
- जिला: जालोर। प्राचीन नाम: श्रीमाल
(Shrimal)।
- उत्खनन: 1953-54 में
रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal) द्वारा।
विदेशी व्यापार (Roman Trade):
- रोमन
एम्फोरा (Roman Amphora): यहाँ से एक यूनानी
दुहत्थी सुराही (Double-handled jug) मिली है, जिसे 'रोमन एम्फोरा' कहते
हैं। यह इस बात का सबूत है कि भीनमाल के लोगों का व्यापार रोम (Rome) तक फैला हुआ था।
साहित्यिक महत्व:
- कवि माघ: संस्कृत
के महाकवि माघ की यह जन्मस्थली है (रचना: शिशुपाल वध)।
- ब्रह्मगुप्त: प्रसिद्ध
गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का संबंध भी यहीं से था।
- ह्वेनसांग: चीनी यात्री
ह्वेनसांग यहाँ आया था और उसने इसे 'पी-लो-मो-लो'
(Pi-lo-mo-lo) कहा था।
13. सुनारी सभ्यता (Sunari
Civilization)
यह भारत की प्राचीनतम लौह युगीन सभ्यताओं में से एक है।
यहाँ से वैदिक संस्कृति के भी प्रमाण मिले हैं।
स्थिति एवं भौगोलिक संदर्भ:
- जिला: झुंझुनूं
(खेतड़ी के पास)।
- नदी: कांतली नदी (Kantli River) के तट पर।
सबसे महत्वपूर्ण खोज (Most Important
Finding):
- लोहा गलाने की प्राचीनतम भट्टियाँ: यहाँ से लोहा गलाने की (Iron
Smelting Furnaces) प्राचीनतम भट्टियाँ मिली हैं। यह भट्टियाँ 'धौंकनी' (Bellows) युक्त थीं, जो यह सिद्ध करती हैं कि यहाँ के लोग धातु विज्ञान (Metallurgy)
में अत्यंत निपुण थे।
अन्य साक्ष्य:
- वैदिक आर्यों की बस्ती: इतिहासकारों का मानना है कि वैदिक आर्य यहाँ आकर बसे
थे।
- भोजन: यहाँ
के लोग चावल का प्रयोग करते थे और
घोड़ों से रथ खींचते थे।
- उपकरण: लोहे
के तीर, भाले, और लोहे
का एक प्याला (Bowl) मिला है।
- मृदभाण्ड: यहाँ
से स्लेटी रंग के (Grey Ware) और काले रंग के बर्तन मिले
हैं।
14. कुराड़ा सभ्यता (Kurada
Civilization)
इस सभ्यता को 'औजारों की नगरी' कहा जाता है।
स्थिति:
- जिला: नागौर
(परबतसर तहसील)।
- उपनाम: इसे 'पुरातत्व का पुष्कर' भी कहा जा सकता है (धातु मिलने के कारण)।
प्रमुख खोजें:
- ताम्र संचयी संस्कृति: यह गणेश्वर
के बाद तांबे के उपकरणों का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र था।
- नालीदार टोंटी का कटोरा (Channel Spouted Bowl): यहाँ से एक
विशेष प्रकार का प्याला मिला है जिसमें एक लंबी टोंटी (Spout) लगी है।
- निष्कर्ष: ऐसे बर्तन ईरान (Iran) में मिलते थे। इससे यह सिद्ध होता है कि राजस्थान का संबंध प्राचीन
फारस (Persia/Iran) से था।
- अर्धचंद्राकार चाकू: यहाँ
तांबे के 103 से अधिक औजार मिले हैं, जिनमें विचित्र आकार के चाकू भी शामिल हैं।
15. नगरी सभ्यता (Nagari
Civilization) (ध्यान दें: यह टोंक वाले 'नगर' से अलग है)
स्थिति एवं इतिहास:
- जिला: चित्तौड़गढ़।
- नदी: बेड़च नदी।
- प्राचीन नाम: माध्यमिका (Madhyamika)।
- उल्लेख: इसका
उल्लेख पतंजलि के 'महाभाष्य' और 'महाभारत' में मिलता है। यह प्राचीन 'शिवि जनपद' (Shivi Janapada) की राजधानी थी।
उत्खनन:
- 1904 ई.: डॉ. डी.आर. भंडारकर (D.R.
Bhandarkar) ने यहाँ सबसे पहले खुदाई की थी।
वैष्णव धर्म का प्राचीनतम साक्ष्य:
- घोसुंडी शिलालेख: नगरी के पास ही 'घोसुंडी' गाँव से एक शिलालेख मिला है (द्वितीय
शताब्दी ई.पू.), जो राजस्थान में वैष्णव (भागवत) धर्म के प्रचार का सबसे प्राचीन प्रमाण है।
- मंदिर: यहाँ 'नारायण वाटक' या
विष्णु पूजा के लिए एक चारदीवारी (Enclosure) के
साक्ष्य मिले हैं।
16. ईसवाल सभ्यता (Iswal
Civilization)
इसे प्राचीन राजस्थान की 'औद्योगिक नगरी'
(Industrial City) कहा जाता है।
स्थिति:
- जिला: उदयपुर।
प्रमुख साक्ष्य:
- लौह उद्योग: यहाँ
बड़े पैमाने पर लोहे के औजार बनाए जाते थे। खुदाई में लोहा गलाने का मैल (Iron Slag) और भट्टियाँ भारी मात्रा में मिली हैं।
- ऊँट का दाँत: यहाँ हड्डियों के साथ ऊँट का दाँत मिला है, जो रेगिस्तानी यातायात का संकेत देता
है।
- यहाँ मौर्य काल से लेकर मध्यकाल तक की बस्तियों के
प्रमाण हैं।
17. बरोर सभ्यता (Baror
Civilization)
यह सरस्वती घाटी की एक विशिष्ट सभ्यता है।
स्थिति:
- जिला: गंगानगर
(अनूपगढ़ क्षेत्र)।
- नदी: प्राचीन सरस्वती (घग्घर)।
अनोखी विशेषता (Unique Feature):
- काली मिट्टी के बर्तन: पूरे
भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता के स्थलों पर लाल रंग के बर्तन मिले हैं, लेकिन बरोर एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ काली मिट्टी (Black Soil) के बर्तन भी मिले हैं।
- लाजवर्द
मनके (Lapis Lazuli): यहाँ 'लाजवर्द' पत्थर के
मनके मिले हैं। यह पत्थर केवल अफगानिस्तान (बदख्शां) में मिलता है, जो यह बताता है कि इनका व्यापार अफगानिस्तान तक था।
- बटन के आकार की मुहरें: यहाँ बटन (Button) जैसी
मुहरें मिली हैं।
18. जोधपुरा सभ्यता (Jodhpura
Civilization)
(नाम से भ्रमित न हों, यह जोधपुर में नहीं
है।)
स्थिति:
- जिला: जयपुर
(अब कोटपूतली-बहरोड़)।
- नदी: साबी नदी (Sabi River) के तट पर।
प्रमुख साक्ष्य:
- शुंग व कुषाण कालीन अवशेष: यहाँ मौर्य काल के बाद के भी अवशेष मिले हैं।
- लोहा भट्टी: सुनारी
की तरह यहाँ भी लोहा गलाने की भट्टियाँ मिली हैं।
- मृदभाण्ड: यहाँ
गेरुए रंग के (OCP) बर्तन मिले हैं।
19. गरदड़ा सभ्यता (Gardada
Civilization)
यह स्थल अपनी शैल चित्रकला (Rock Painting) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
स्थिति:
- जिला: बूँदी।
- नदी: छाजा नदी (Chhaja
River)।
बर्ड राइडर (Bird Rider):
- यहाँ की एक चट्टान पर 'बर्ड राइडर' (पक्षी पर सवार मानव) का चित्र मिला है। यह भारत की प्राचीनतम रॉक
पेंटिंग्स में से एक है (Late Stone Age)।
- यहाँ शुतुरमुर्ग (Ostrich) जैसे
पक्षियों के भी चित्र हैं।
20. तिलवाड़ा सभ्यता (Tilwara
Civilization)
स्थिति:
- जिला: बाड़मेर
(बालोतरा क्षेत्र)। नदी: लूनी नदी।
साक्ष्य:
- यह बागोर (भीलवाड़ा) के समकालीन है।
- यहाँ भी पशुपालन के प्राचीन साक्ष्य मिले हैं।
- अग्निकुंड: यहाँ
मानव अस्थियों के साथ अग्निकुंड (Fire pits) के
साक्ष्य मिले हैं।
- पास ही में लोकदेवता मल्लीनाथ जी का प्रसिद्ध मंदिर है।
21. नलियासर सभ्यता (Naliasar Civilization)
स्थिति:
- जिला: जयपुर
(सांभर झील के पास)।
प्रमुख साक्ष्य:
- मुद्राएँ: यहाँ 105 तांबे की मुद्राएँ मिली हैं।
- इंडो-ग्रीक सिक्के: यहाँ
से यूनानी शासकों और हुविष्क (कुषाण राजा) के सोने के सिक्के मिले हैं।
- यौधेय गण: यौधेय
गणराज्य के सिक्के भी यहाँ मिले हैं, जो बताते
हैं कि उत्तरी राजस्थान में गणतंत्रात्मक व्यवस्था थी।
22. अन्य छोटे स्थल (One-Liner
Facts):
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स्थल का नाम |
जिला |
मुख्य विशेषता (Key Fact) |
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चंद्रावती |
सिरोही (आबू रोड) |
यहाँ 11वीं-12वीं
सदी के परमार वंश की राजधानी थी। कर्नल टॉड ने इसे खोजा था। हाल ही में यहाँ उत्खनन हुआ है। |
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बांका |
भीलवाड़ा |
यहाँ राजस्थान की प्रथम अलंकृत
गुफा (First Ornamented Cave) मिली है। |
|
ओला और कुंडा |
जैसलमेर |
कुंडा से प्राचीनतम चूहे के दाँत के जीवाश्म (Fossils) मिले हैं। ओला से पाषाण कालीन कुल्हाड़ी मिली है। |
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डडीकर |
अलवर |
यहाँ 5-7 हजार वर्ष पुराने शैल चित्र (Rock
Paintings) मिले हैं। |
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सोथी |
बीकानेर |
इसे 'कालीबंगा प्रथम' (Kalibangan-I) कहा जाता है। इसकी खोज अमलानंद घोष ने 1953
में की थी। |
|
खानपुरा |
झालावाड़ |
यहाँ से 200 किलोमीटर लंबी 'शैल चित्र' शृंखला मिली है (नदी घाटी में)। |